समय


प्रिय मित्रों, जिस भी समय में आप हैं तभी का नमस्कार स्वीकार करें | भगवान श्री सीता राम जी की कृपा आप पर सदैव बनी रहे |
यह हमेशा से कहा गया है की समय बहुत मूल्यवान है, समय के साथ सब बदलता रहता है | जो समय के साथ नहीं चलता वो समय से पीछे छूट जाता है और जो समय से आगे चलने की ज्यादा कोशिश करता है उसे भी बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है| इसीलिए बड़े बुजुर्ग कहते हैं की समय के साथ चलना चाहिए |
कालचक्र
चित्र साभार - http://decodehindumythology.blogspot.com/p/mythology.html

इस दुनिया में ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो हम नियंत्रित नहीं कर सकते, समय उनमें से एक है | इसको हम अपने कर्तव्यों  से एक दिशा कर सकते हैं | भगवान श्री कृष्ण ने भगवत गीता के तृतीय अध्याय के 19 वें श्लोक में कहा हैं की,
                                        "तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
                                         असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ॥"
भावार्थ: अत: कर्म फ़ल में आसक्त हुए बिना मनुष्य को अपना कर्तव्य समझ कर कर्म करते रहना चाहिये क्योंकि अनासक्त भाव से निरन्तर कर्तव्य कर्म करने से मनुष्य को एक दिन परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है।

अर्ताथ हमें कर्तव्य करते जाना है, फल अवस्य ही मिलेगा | हमारे लिए समय पर ही कर्तव्य करते जाना सर्वोपरि है, समय पर जो भी हमें करना हैं वो पूरा होना चाहिए क्योंकि गया हुआ समय वापस नहीं आता |

किसी भी कार्य को जब भी हम  कर रहे होते है तो बहुत सारी मुश्किलें आती है परन्तु हमें  डंट के सामना करना है |  समय हमेशा हमारा मूल्यांकन करता रहता है | जब भी कभी मुश्किल घडी ख़त्म हो और हम पलट के कर के देखें की हमने क्या किया तो अपने किये हुए पे हमें खेद ना हो |

समय परिवर्तनशील है, यंहा पर कुछ भी निरंतर नहीं है, यह आवश्यक नहीं है जो भी हमारे  साथ शुरू में है वो आपके वह हमारे साथ आखिरी तक रहें | आदि और अनन्त में में सब कुछ समान नहीं हो सकता है, अगर हैं तो हमने कर्म ही नहीं किया है|  इस सफर में हमारे कुछ करीबी हमारा साथ छोड़ जायेंगे, कुछ हमसे रास्ता बदल लेंगे | यही संसार का नियम है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने भगवत गीता के तृतीय अध्याय के वें श्लोक में कहा है,

श्री कृष्ण जी अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए
चित्र साभार - Dolls of India 
                                             
                                                 "न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
                                                  न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥"
भावार्थ : मनुष्य न तो बिना कर्म किये कर्म-बन्धनों से मुक्त हो सकता है और ना ही कर्मों के त्याग (सन्यास) मात्र से सफ़लता (सिद्धि) को प्राप्त हो सकता है।

सभी को सुचित या अनुचित कर्म करना ही पड़ेगा इसीलिए अगर कोई हमसे विमुख हो तो इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है वो गलत है या हम सही है क्योंकि हम जो भी कर्म करेंगे उसके तदर्थ ही हमको फल की प्राप्ति होगी | हमें उनके योगदान को याद करना चाहिए जो जब हमारे साथ थे और जब हमसे अच्छा व्यवहार किया | संसार में कुछ भी अस्थायी नहीं है इसीलिए जो हमारे है हमें उनका उचित सम्मान करना चाहिए |

महान कवि रहिम दास जी नें कभी कहा है,
                                           "समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात |
                                               सदा रहै नहीं एक सी, का रहीम पछतात" ||
इसीलिए हमें सभी के साथ समान व्यवहार करना चाहिए,धन के आधार पे या किसी और भी तरीके से हमें लोगो का वर्गीकरण नहीं करना चाहिए | हमारी मातृभाषा जब सबके नाम के साथ एक जैसा व्यवहार करती है, सबके नाम एक जैसे लिखे जाते है, एक जैसे पढ़े जाते है तो हमें कोई अधिकार नहीं है लोगो को अलग करने का | संसार के सभी प्राणियों से प्रेम करिये एवं प्रेम का सन्देश फैलाइये |
भारत माता को गर्वान्वित करने किये कर्मठ कीजिये, सनातन धर्म को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दीजिये |
प्रभु श्री सीताराम जी की कृपा आप पर और आपके चाहने वालो पर बनी रहै ||

भारत माता की जय
शुभम त्रिपाठी

प्रथम प्रयास  हैं, त्रुटियों के छमा कीजिए एवं अपने सुझाव नीचे अंकित ईमेल पे भेजिए | हमें सुधार करने में आसानी होगी

Info@shubhamtripathi.in
Instagram
Facebook
Twitter
धन्यवाद









संग तुम्हारे जीवन की ये राहें

संग तुम्हारे जीवन की ये राहें सीताराम जी की कृपा से, चार महीने संग चलते रहे, हाथों में हाथ थामे, संग-संग जीवन के हर कदम बढ़ाते रहे। तुम हो म...