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Showing posts from 2026

जब जीवन की नाव डगमगाए — केवल एक सहारा: जगन्नाथ

कभी-कभी जीवन ऐसा मोड़ ले लेता है जहाँ हर दिशा धुंधली लगती है। प्रयास करते-करते मन थक जाता है, रिश्ते साथ छोड़ते से प्रतीत होते हैं, और भीतर एक गहरी पुकार उठती है—“अब कौन सम्भालेगा?” ऐसे ही क्षणों में भक्ति का भाव जन्म लेता है। वह भाव, जो हमें अपने ईश्वर की शरण में ले जाता है। मेरे हृदय की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है—मानो मेरी जीवन-नाव एक विशाल सागर में तैर रही हो, जहाँ लहरें कभी शांत तो कभी प्रचंड हो उठती हैं। उस समय मन से बस यही शब्द निकलते हैं: “मेरी नाव सिर्फ एक तेरे सहारे, तूं ना सम्भालें तो हमें कौन सम्भाले।” यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समर्पण का अनुभव है। जब मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि उसकी सीमाएँ हैं, तब ही वह ईश्वर की असीम शक्ति को अनुभव कर पाता है। नीलाचल के स्वामी, जगन्नाथ—जिनकी आँखें सम्पूर्ण सृष्टि को देखती हैं—उनसे यह विनती है कि वे हमारी डगमगाती नाव को दिशा दें। क्योंकि जब हर द्वार बंद हो जाए, तब एक ही द्वार शेष रहता है—भक्ति का। “तुझे छोड़ जाऊं मैं अब किस-किसके द्वारे, तूं ना सम्भालें तो हमें कौन सम्भाले।” यह प्रश्न केवल शब्द नहीं है, यह उस भक्त की पीड़ा है जो...

श्री सीता राम जी विवाह महोत्सव — मिथिला की दिव्य झांकी

          🌸 सीता जी के विवाह का आँखों देखा दिव्य प्रसंग 🌸 जैसे मैं स्वयं मिथिला के उस मंडप में उपस्थित हूँ… आज का दिन कुछ अलग है… हवा में एक अजीब सी पवित्रता है। मैं मिथिला नगरी की गलियों से गुजर रहा हूँ और हर ओर बस एक ही नाम गूंज रहा है— राम… राम… सियाराम… ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो समय ठहर गया हो… और त्रेतायुग मेरे सामने जीवंत हो उठा हो। ✨ बारात का आगमन — एक अलौकिक दृश्य अभी-अभी मैं नगर के द्वार के पास पहुँचा ही था कि दूर से शंख और नगाड़ों की ध्वनि सुनाई देने लगी। मैं जल्दी से आगे बढ़ा… हाँ! अयोध्या से आई बारात मिथिला में प्रवेश कर चुकी है। चारों ओर लोग उमड़ पड़े हैं। महलों की झरोखियों से सखियाँ झांक रही हैं। मैं उनके पास खड़ा होकर उनकी बातें सुनने लगा— “अरे देखो-देखो, बारात में चार राजकुमार हैं!” उनकी आँखों में उत्सुकता है… और फिर अचानक वे हाथ जोड़कर आकाश की ओर देखती हैं— “हे विधाता! बारात भले एक की आई हो, पर कृपा ऐसी करना कि चारों भाइयों का विवाह यहीं हो जाए…” उनकी यह प्रार्थना सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए… कितना निष्कपट प्रेम! 🌿 मटकोर की रस्म — परंप...