कभी-कभी जीवन ऐसा मोड़ ले लेता है जहाँ हर दिशा धुंधली लगती है। प्रयास करते-करते मन थक जाता है, रिश्ते साथ छोड़ते से प्रतीत होते हैं, और भीतर एक गहरी पुकार उठती है—“अब कौन सम्भालेगा?” ऐसे ही क्षणों में भक्ति का भाव जन्म लेता है। वह भाव, जो हमें अपने ईश्वर की शरण में ले जाता है।
मेरे हृदय की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है—मानो मेरी जीवन-नाव एक विशाल सागर में तैर रही हो, जहाँ लहरें कभी शांत तो कभी प्रचंड हो उठती हैं। उस समय मन से बस यही शब्द निकलते हैं:
“मेरी नाव सिर्फ एक तेरे सहारे,
तूं ना सम्भालें तो हमें कौन सम्भाले।”
यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समर्पण का अनुभव है। जब मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि उसकी सीमाएँ हैं, तब ही वह ईश्वर की असीम शक्ति को अनुभव कर पाता है।
नीलाचल के स्वामी, जगन्नाथ—जिनकी आँखें सम्पूर्ण सृष्टि को देखती हैं—उनसे यह विनती है कि वे हमारी डगमगाती नाव को दिशा दें। क्योंकि जब हर द्वार बंद हो जाए, तब एक ही द्वार शेष रहता है—भक्ति का।
“तुझे छोड़ जाऊं मैं अब किस-किसके द्वारे,
तूं ना सम्भालें तो हमें कौन सम्भाले।”
यह प्रश्न केवल शब्द नहीं है, यह उस भक्त की पीड़ा है जो संसार की अस्थिरता को पहचान चुका है। जब मन यह समझ लेता है कि कोई भी स्थायी सहारा नहीं है, तब वह सच्चे सहारे की खोज करता है—और वह सहारा केवल ईश्वर ही हो सकते हैं।
जगन्नाथ स्वामी को ‘नैन के तारे’ कहना, केवल प्रेम नहीं बल्कि एक गहरी आत्मीयता का संकेत है। जैसे आँखों की रोशनी के बिना जीवन अधूरा है, वैसे ही प्रभु के बिना आत्मा अधूरी है।
“जगन्नाथ स्वामी मेरे नैन के तारे,
मेरे सारे काज स्वामी आप सवारें।”
इस भाव में पूर्ण विश्वास छिपा है—कि जब हम अपने कर्मों को प्रभु को समर्पित कर देते हैं, तब वे स्वयं हमारी राहें सरल कर देते हैं। हमें बस सच्चे मन से पुकारना होता है।
अंततः, यह गीत हमें सिखाता है कि जीवन चाहे जितना भी जटिल क्यों न हो जाए, समाधान समर्पण में है। जब हम अपनी नाव की पतवार प्रभु को सौंप देते हैं, तब भय समाप्त हो जाता है।
तो आइए, इस भाव को अपने जीवन में उतारें—
जब भी मन डगमगाए, बस इतना याद रखें:
“तूं ना सम्भालें तो हमें कौन सम्भाले…”
और फिर देखिए, कैसे भीतर शांति का सागर उमड़ पड़ता है।
