कभी-कभी जीवन ऐसा मोड़ ले लेता है जहाँ हर दिशा धुंधली लगती है। प्रयास करते-करते मन थक जाता है, रिश्ते साथ छोड़ते से प्रतीत होते हैं, और भीतर एक गहरी पुकार उठती है—“अब कौन सम्भालेगा?” ऐसे ही क्षणों में भक्ति का भाव जन्म लेता है। वह भाव, जो हमें अपने ईश्वर की शरण में ले जाता है। मेरे हृदय की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है—मानो मेरी जीवन-नाव एक विशाल सागर में तैर रही हो, जहाँ लहरें कभी शांत तो कभी प्रचंड हो उठती हैं। उस समय मन से बस यही शब्द निकलते हैं: “मेरी नाव सिर्फ एक तेरे सहारे, तूं ना सम्भालें तो हमें कौन सम्भाले।” यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समर्पण का अनुभव है। जब मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि उसकी सीमाएँ हैं, तब ही वह ईश्वर की असीम शक्ति को अनुभव कर पाता है। नीलाचल के स्वामी, जगन्नाथ—जिनकी आँखें सम्पूर्ण सृष्टि को देखती हैं—उनसे यह विनती है कि वे हमारी डगमगाती नाव को दिशा दें। क्योंकि जब हर द्वार बंद हो जाए, तब एक ही द्वार शेष रहता है—भक्ति का। “तुझे छोड़ जाऊं मैं अब किस-किसके द्वारे, तूं ना सम्भालें तो हमें कौन सम्भाले।” यह प्रश्न केवल शब्द नहीं है, यह उस भक्त की पीड़ा है जो...
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